1.3.25 प्रिय रमेश! पर...
क्षितिज में नील ज...
‘‘अभी तो पहना गई ...
‘‘क्या अब वे दिन ...
तामसी रजनी के हृद...
उद्यान की शैल-माल...
चंदा के तट पर बहु...
सन्ध्या की कालिम...
‘‘बाबूजी, एक पैसा...
शरद्-पूर्णिमा थी...