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1983 में कवि, सम्पादक और संस्कृतिकर्मी महेश्वर का गाया एक दुर्लभ गीत।
शहीदों के लिए / शशिप्रकाश
ज़िन्दगी लड़ती रहेगी, गाती रहेगी
नदियाँ बहती रहेंगी
कारवाँ चलता रहेगा, चलता रहेगा, बढ़ता रहेगा
मुक्ति की राह पर
छोड़कर साथियो, तुमको धरती की गोद में ।
खो गए तुम हवा बनकर वतन की हर साँस में
बिक चुकी इन वादियों में गन्ध बनकर घुल गए
भूख से लड़ते हुए बच्चों की घायल आस में
कर्ज़ में डूबी हुई फसलों की रंगत बन गए
ख़्वाबों के साथ तेरे चलता रहेगा...
हो गये कुर्बान जिस मिट्टी की ख़ातिर साथियो
सो रहो अब आज उस ममतामयी की गोद में
मुक्ति के दिन तक फ़िज़ाँ में खो चुकेंगे नाम तेरे
देश के हर नाम में ज़िन्दा रहोगे साथियो
यादों के साथ तेरे चलता रहेगा...
जब कभी भी लौट कर इन राहों से गुज़रेंगे हम
जीत के सब गीत कई-कई बार हम फिर गाएँगे
खोज कैसे पाएँगे मिट्टी तुम्हारी साथियो
ज़र्रे-ज़र्रे को तुम्हारी ही समाधि पाएँगे
लेकर ये अरमाँ दिल में चलता रहेगा...
Poem courtesy kavitakosh.org
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