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Dir by Habib Tanvir (1 September 1923 – 8 June 2009)
हबीब तनवीर के नाटक 'हिरमा की अमर कहानी' से एक गीत
जगत में मन से है दू परकार
एक निर्धन है एक धनवान जगत में मन से है दू परकार
एक का जो आकाश है वो है दूजे का पाताल
एक का जो भोजन है वही तो है दूजे का काल
एक की बेकारी से है दूजे का का कारोबार
इसके माल के दम पे लगा है दुनिया का बाज़ार
इसके खून के बल पे चला है दुनिया का ब्योपार
इसके भीख के बल पे खड़े हैं दुनिया के सरकार
जगत में मन से है दू परकार
एक निर्धन है एक धनवान जगत में मन से है दू परकार
(धुन परिवर्तन)
कौनो पर धन है और कौनो पे सत्ता
भगवान बिना जीवन नई चले भाई
गरीब के भगवान बिना जीवन नई तो चले
पृथ्वी आकाश वायु जल अग्नी
इन्हीं से पेड़ इन्हीं से प्राणी
अग्नि पवन और जल नहीं अपना
पेड़ और फूल और फल नहीं अपना
कुछ नहीं अपना जब कुछ नहीं अपना
तो भगवान बिना जीवन नहीं चले भाई
गरीब के भगवान बिना जीवन नई तो चले
उनके पास सुख के सब साधन
उनका जगत उनका ही सब धन
वही गरीबी के निर्माता
चोर वही हैं वही अन्नदाता
अपने पास बस एक विधाता -
भगवान बिना जीवन नहीं चले भाई
गरीब के भगवान बिना जीवन नई तो चले
जगत में मन से है दू परकार
एक निर्धन है एक धनवान जगत में मन से है दू परकार
Text transcription Irfan
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