Search

Home > Listen with Irfan > Film Review | Ghodey Ko Jalebi Khilane Le Ja Riya Hun
Podcast: Listen with Irfan
Episode:

Film Review | Ghodey Ko Jalebi Khilane Le Ja Riya Hun

Category: Arts
Duration: 00:16:30
Publish Date: 2022-06-09 18:15:13
Description:

Conceived, Devised, Written and Produced by Irfan 

Audio Courtesy : Gutterati Productions 

घोड़े को जलेबी खिलाने ले जा रिया हूँ अनामिका हक्सर की पहली फीचर लेंथ फिल्म है और जैसा कि अक्सर देखा गया है कि निर्देशक अपनी पहली फिल्म में अपने सारे अरमान पिरो देता है। फिल्म का कोई कथानक नहीं है। कम से कम प्रचलित अर्थों में बिलकुल ही नहीं। यानी अगर आप फिल्म में कोई कहानी ढूँढें जिसका कोई आरम्भ मध्य और अंत हो, तो वह इसमें नहीं है।

तो आप पूछेंगे कि फिल्म में क्या है ?

फिल्म में पुरानी दिल्ली है, उसकी गलियां हैं, कूड़े के ढेर हैं, नशेड़ी, जेबकतरे, उठाईगीरे, बेघर और आवारा लोग हैं, परित्यक्ता और विधवाएं हैं, क़ब्र में पैर लटकाए बूढ़े, मारी तताडी औरतें, रेहड़ी पटरी पर बसर करने वाले, पल्लेदार ----गोया हर वो शख्स और शै जो एलीटिस्ट आर्ट के दायरे से बाहर है, वो फिल्म के भीतर है। बल्कि इससे भी एक कदम आगे बढ़ कर फिल्म में समेटी गयी इस दुनिया के सपने ---उनके ख्वाब फिल्म की योजना का आधार है। और ज़्यादातार बार ये सपने ये ख्वाब नाइटमेयर्स ही हैं।

फिल्म का एक पृथक संसार पुरानी दिल्ली के इतिहास, गौरव उर्फ़ झूठी शान के शामियाने की तरह ताना गया है जिसके नीचे भूखे, उदास और निराश बैंड बाजे वाले एक ऎसी धुन बजा रहे हैं जो ढंग से न अतीत का कोई दस्तावेज़ी सुराग़ छोड़ती है न वर्तमान की कोई टीस पैदा करती है। और यह प्रति संसार एक ढहती हुई सभ्यता की एक दूसरे को काटती हुई छवियों की शक्ल में सामने आता है।

फिल्म की शुरुआत कम्युनिस्ट इंटरनेशल की धुन से होती है और हम एनिमेटेड मैनर में एक मज़दूर को एक विशाल विस्तृत लाल झंडा लिए हुए देखते हैं जो ताहद्देनज़र शहर को अपनी आगोश में लिए हुए है या कहिये दृश्य में आनेवाली सभी बस्तियां उस लाल झंडे से आच्छादित हैं, एक लाल नदी गलियों, बाज़ारों, घरों, बस्तियों से निकलती हुई क्षितिज तक चली गयी है।

अब आप शायद समझ गए होंगे कि फिल्म एक निश्चित आस्थागत धरातल पर खड़े होकर बनाई गयी है और वो एक ज़रूरी धरातल है जिसे खाद पानी मिलता है एम्पैथी से। फिल्म में एकाधिक बार एक शब्द सुनाई पड़ता है - सबऑलटर्न। और यह सबऑलटर्न कथाकथन लौट लौटकर मज़दूरों की मांसल श्रम गतिविधियों और छीन ली गयी मानवीय गरिमा को छवियों, प्रतीकों और ध्वनियों के माध्यम से सामने आता है।

पुरानी दिल्ली के जीवन का अभिन्न अंग होने के नाते ये बहुत स्वाभाविक था कि जामा मस्जिद, कुश्ती के अखाड़े , उनका सिग्नेचर साउंड, गलियों की आवाज़ें, खान पान, बोली भाषा, दरगाहें, कव्वालियां, पतंगबाजी, शादी ब्याह और बैंड बाजे, शेरो शायरी और दैनंदिन जीवन का नाटकीय व्यवहार फिल्म में आता, जो कि आया भी। चूँकि फिल्म घटनात्मकता से कोसों दूर है इसलिए विजुअल ग्राफिक्स, एनीमेशन और स्पेशल इफेक्ट्स के ज़रिये चौंकाने, एकरसता तोड़ने और दृश्य को मल्टीलेयर्ड बनाने की कोशिश की गयी है। ये सिनेमाई प्राविधि इसलिए भी ज़रूरी थी कि हाशिये पर फ़ेंक दिए गए लोगों के सपनों की अक्कासी की जा सके।

फिल्म में एक मजदूर नेता भी निरंतर अपनी उपस्थिति बनाए रखता है और आखिर में एक भाषण भी देता है जिसका आशय शोषण की चली आ रही व्यवस्था को बता सकना है।

चूँकि यह फिल्म फंसे, उलझे, बेबस और निराश हो चुके संसार को नजदीक से देखना और दिखाना चाहती है इसलिए सिनेमैटोग्राफी और साउंड के अलावा एडिटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन पर भारी ज़िम्मेदारी आनी थी जो इन सभी विभागों ने बखूबी निभाई है।

मेरी दिलचस्पी फिल्म के अंत को लेकर थी जो बहुत प्रेडिक्टेबल ढंग से उन बच्चों के संगीत से ही हुई जो यूट्यूब पर मौजूद FOLI की याद दिलाता है और जो फिल्मकार की आशावादी सदिच्छा भर है।

अभिनेताओं ने बहुत मेहनत से अपनी भूमिकाएं निभाईं। फिल्म में रघुवीर यादव भी हैं जो इसलिए ज़रूरी थे कि पुरानी दिल्ली के फेरीवालों की बहुचर्चित स्टाइल को अपनी गायकी में पेश कर सकें। खुद रघुवीर यादव को ऐसा लगता है कि फिल्म के बीच बीच में उनका छिड़काव सा कर दिया गया है। 


(contd)

Featuring Lokesh Jain, Ravindra Sahu, Raghubir Yadav, Arun Kumar Kalra, A K Gopalakrishnan

Directed and Produced by Anamika Haksar

Production designer Archana Shastri

Editor Paresh Kamdar

DOP Somo Sahi

Music Tyrax

Sound Gautam Nair

Cover Art: Film's Official Poster





--- Send in a voice message: https://anchor.fm/sm-irfan/message
Total Play: 0